शुक्रवार, 27 मई 2011

आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है

दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है.

(विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' से)

गुरुवार, 26 मई 2011

उतर जाए छाती

उतर जाए छाती में जिगरवा काट डाले है
मुई महंगाई ऐसी है ,छरी बरछी कटारी है

गुरुवार, 19 मई 2011

musavvir ka inkeshaf hu mai

manazir ki dilkashi,musavvir ka inkeshaf hu mai
ibteda inteha k darmiyan,mukhtasar sawal hu mai.

maukuf hasraton k darmiyan,khyalon ki talabgar hu mai.
zeest k roshni k muqabil ,na bahaut door na bahaut pas hu mai

bahaut dino se tere pas hu mai.phir tu bata kyu udas hu mai.

गुरुवार, 12 मई 2011

'Mir' un nim-baz ankhon main

hasti apni hubab ki si hai
ye numaish sarab ki si hai

nazuki us k lab ki kya kahiye
pankhari ik gulab ki si hai

bar bar us k dar pe jata hun
halat ab iztirab ki si hai

main jo bola kaha k ye awaz
usi khana-kharab ki si hai

'Mir' un nim-baz ankhon main
sari masti sharab ki si hai

बुधवार, 11 मई 2011

कैफ़ी आज़मी --ek ghazal

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े


इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े


साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पडे


मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

मंगलवार, 10 मई 2011

inkeshaf alam: मस्जिद में धमाका मामले में इंद्रेश से पूछताछ

inkeshaf alam: मस्जिद में धमाका मामले में इंद्रेश से पूछताछ

inkeshaf alam: सरकार कि अदालत,अदालत कि सरकार

inkeshaf alam: सरकार कि अदालत,अदालत कि सरकार

inkeshaf alam: who refuse that a hindu cant do a terrorist conspiracy

inkeshaf alam: who refuse that a hindu cant do a terrorist conspiracy

inkeshaf alam: kuch badal se gayae

inkeshaf alam: kuch badal se gayae

inkeshaf alam: फैज़

inkeshaf alam: फैज़

inkeshaf alam: why why why

inkeshaf alam: why why why

inkeshaf alam: इसी शहर में आसानी से (jessica lal case study)

inkeshaf alam: इसी शहर में आसानी से (jessica lal case study)

inkeshaf alam: रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

inkeshaf alam: रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

ईसाई नहीं। यहूदी या मुस्लिम नहीं।
हिंदू, बौद्ध, सूफी या जेन भी नहीं।

न किसी धार्मिक-सांस्कृतिक प्रणाली के तहत।
मैं न पूर्व से आया न पश्चिम से।
न समुद्र से निकला न उगा धरती पर।

न लौकिक, न अलौकिक।
किसी भी तत्व से
निर्मित नहीं हुआ मैं।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
मैं न इस लोक का न परलोक का।
न आदम और हव्वा की संतान।
न सृष्टि की उत्पत्ति की
किसी कहानी की उपज।
मेरी कोई जगह नहीं
कहीं कोई निशान नहीं।
मैं जानता हूं तो केवल अपने प्रिय को।
मैंने दो दुनिया को एक की तरह देखा है।
और वह एक दुनिया पुकारती है
प्रथम, अंतिम, बाहरी, भीतरी,
केवल एक सांस को

सांस लेते इंसान को।

शनिवार, 7 मई 2011

गुलज़ार

नींद की चादर चीर के बाहर निकला था मै ,
आधी रात एक फोन बजा था....

दूर किसी मोहूम सिरे से
इक अनंजान आवाज ने छूकर पूछा था
आप ही वो शायर है जिसने
अपनी कुछ नज्मे सोना के नाम लिखी है
मेरा नाम भी सोना हो तो ?

इक पतली सी झिल्ली जैसी ख़ामोशी का लम्बा वक्फा
मेरे नाम इक नज़्म लिखो ना !
मुझको एक छोटे से शेर में सी दो ,
"अंजल "लिखना
शायद मेरी आखरी शब् है
आखिरी ख्वाहिश है ,मै आप को सौप के जायूं?"
फोन बुझाकर
धज्जी धज्जी नींद में फिर जा लेटा था मै !

अंजल !
इसके बहुत दिनों बाद मालूम हुआ था
दर्द से दर्द बुझाने की इक कोशिश में तुम
केंसर की उस आग में मेरी नज्मे छिड़का करती थी .....

नींद भरी वो रात कभी याद आये तो
अब भी ऐसा होता है
एक धुआ सा आँखों में भर जाता है 

"गुलज़ार "