रविवार, 11 दिसंबर 2011

दिल तोड़ के चले हो उसे फिर से जोड़ने

दिल तोड़ के चले हो उसे फिर से जोड़ने
समझो तो पहले कौन से टुकड़े कहाँ के हैं .

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

सजदे जो आवारा हो गए ...............

सजदे जो आवारा हो गए ...............
वो शज़र हूँ गुल-ओ-बार न साया मुझमे
बागबाँ ने लगा रक्खा है मगर काटने को .......

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम खा

बस यही आरजू है की इन्सान को दुन्या में एक मज़बूत और  मुकम्मल देखूं . और अल जहाँ को अमन में ज़िन्दगी गुज़रते देखू '
दुआ एक रास्ता भर है: जीने का शौक पैदा करती है दुआ,और बदलने की जुस्तुजू .
खलील जिब्रान ने अपनी कहानी "खलील द हेरिटेज "में दुआ की थी
ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम  खाओ और हमारी फरयाद सुनो !नील नदी के उद्गम से लेकर फिरत नदी के मुहाने तक
के तमाम लोगो की फर्यादे,और दर्द में डूबी चीखें तुम तक पहुच रही हैं .दिव्प से लेकर लेबनान तक सभी तुम्हारे तरफ अपने कांपते हुए हाँथ कुछ इस तरह  बढ़ा रहे हैं !जैसे लोग आखेई साँसे गिन रहें है !फारस की कड़ी के किनारे से रेगिस्तान की सरहद तक ग़म में डूबे हुए लोगो की आँखे तुम्हारी तरफ उठ रहीं है "

कुछ अनुभव ऐसे होते हैं

 कुछ अनुभव ऐसे होते हैं
या यूँ कहें की बहुत कम अनुभव ऐसे होते हैं
जिन्हें हम कभी भी पूरी तरह
व्यक्त कर पाने में समर्थ नहीं होपाते हैं
ये अनुभव अपनी आधी अधूरी
ज़िन्दगी के साथ ,हमारे अन्दर
किसी मुकम्मल अनुभव की तरह रहने लगते हैं
आधा-अधूरा अविस्मर्णीय
आनंदमयी और अवसादपूर्ण
होने के साथ साथ
ये चिरायु भी होते हैं
और मेरे साथ दुर्भाग्य या भाग्य से
ये अनुभव कुछ से थोड़े ज़यादा हैं 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मेरे पास चीज़े चीज़े मेरे पास .

i thought between my packing how many thing i have in my life. to put in my bag.
चीज़े मेरे पास ;
मेरे पास चीज़े !
कुछ कमीज़ एक पेन
एक बक्सा !
एक नोटबुक
कुछ तथाकथित विचारवादी पुस्तकें !
दो चार या ज़यादा यादें
देल्ली के कुछ खंडहर
एक शाम मुंबई की
कुछ दिन अपने गाँव के
कुछ प्रेम पत्र,खुद के लिखे
दो लोगो के चेहरे बिलकुल सपाट
फूटपाथ की तरह
एक लड़की कुछ भोली सी ,कुछ गुमसुम सी
कुछ कडवे एहसास
कुछ मीठे एहसास
मेरे पास चीज़े
चीज़े मेरे पास .

अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !

"उम्मीद " वसे तो इस लफ्ज़ को ही गलत मानता हूँ मै! क्यूंकि सही लफ्ज़ है "चाहत"और अगर इसको इसी तरह सही करते जाएँ तो बनेगा "तमन्ना " "आरजू " "ख्वाहिश" और उसके आगे लगाना पड़ेगा मेरी ! और तब जाके मतलब बनेगें !
                       मेरी ख्वाहिश है की ऐसा होजाए ,तीन दिन से ऐसा सोच रहा हूँ !और दुआ भी कर रहा हूँ !अब जब एक शख्श कहीं दिल के एक छोटे से गोशे से भी दुआ मांगता है तो उससे ईमान की सनद मांगना बेवकूफी ही होगी,
अगर उसने अपने दिल में दुआ की तो उसने क्या सोच होगा -?
                         आलम बाखबर ने दो बार पेंसिल उठाया कागज़ तक लगाया और वापिस रख दिया !उसको यकीन है की वो पेंसिल अब हमेशा उसके पास रहेगी अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !


रविवार, 4 दिसंबर 2011

वही इन्केलाब में काम आयेगा !

 खामोश होके लड़ना बड़ा मुश्किल होता है !और हार भी तै है फिर चाहे आपके तरकश में जितने भी तीर हो ,जब आप उसे चलाये हे नहीं !पर मेरे पास तो लफ्जों के तीर भी कम हैं !बड़ी मुश्किल से एक दो लोगो से कुछ कह्पने की हिम्मत कभी कभी की तो ऐसी मुह की खाई की बस पुचो मत !

लेकिन सुनये तो जनाब मै तो ये कह रहा हूँ की अगर आप के पास ये फन नाहे तो इसका मतलब ये नहीं है की आप इन्केलाब नहीं लासकते ! उठए देखिये कोई तो एक ऐसा फन है आपमें जो सबसे अलग भगवन ने आपको दिया है वही इन्केलाब में काम आयेगा !

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

,अभी तो बस जंग के ख़त्म होने की दुआ कर रहा हूँ !

कल या कल के पहले कभी तुमने इतनी गंभीरता से पहले नहीं सोचा होगा ,पर अब सोचना अगर तुम मेरी महबूबा हो तो क्या बात है की मैं जंगलो में जाना चाहता हूँ !क्यं मै जाना चाहता हूँ उस बस्ती में जहाँ काली छाया
रहती है !बस क्यूँ दुनया से लड़ने में ही शहीद होजाना चाहता हूँ मै!जीत की अकंछा क्यं नहीं पाली मैंने ! मै क्यूँ चाहता हूँ की जिन रास्तो पर चलूं वहां सिर्फ रेत ही रेत हो दोपहर के सूरज से गर्म और मै नंगे पांव उसमे उतर के भटक जाऊ !जंग इतनी सख्त तो नहीं है !आज और आज के बाद इस बारे में ज़रूर सोचना !तबतक मै फिर तुम्हारे सपने में आने की कोशिश करूँगा ज़िन्दगी ,अभी तो बस जंग के ख़त्म होने की दुआ कर रहा हूँ !