मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम खा

बस यही आरजू है की इन्सान को दुन्या में एक मज़बूत और  मुकम्मल देखूं . और अल जहाँ को अमन में ज़िन्दगी गुज़रते देखू '
दुआ एक रास्ता भर है: जीने का शौक पैदा करती है दुआ,और बदलने की जुस्तुजू .
खलील जिब्रान ने अपनी कहानी "खलील द हेरिटेज "में दुआ की थी
ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम  खाओ और हमारी फरयाद सुनो !नील नदी के उद्गम से लेकर फिरत नदी के मुहाने तक
के तमाम लोगो की फर्यादे,और दर्द में डूबी चीखें तुम तक पहुच रही हैं .दिव्प से लेकर लेबनान तक सभी तुम्हारे तरफ अपने कांपते हुए हाँथ कुछ इस तरह  बढ़ा रहे हैं !जैसे लोग आखेई साँसे गिन रहें है !फारस की कड़ी के किनारे से रेगिस्तान की सरहद तक ग़म में डूबे हुए लोगो की आँखे तुम्हारी तरफ उठ रहीं है "

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