रविवार, 11 दिसंबर 2011

दिल तोड़ के चले हो उसे फिर से जोड़ने

दिल तोड़ के चले हो उसे फिर से जोड़ने
समझो तो पहले कौन से टुकड़े कहाँ के हैं .

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

सजदे जो आवारा हो गए ...............

सजदे जो आवारा हो गए ...............
वो शज़र हूँ गुल-ओ-बार न साया मुझमे
बागबाँ ने लगा रक्खा है मगर काटने को .......

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम खा

बस यही आरजू है की इन्सान को दुन्या में एक मज़बूत और  मुकम्मल देखूं . और अल जहाँ को अमन में ज़िन्दगी गुज़रते देखू '
दुआ एक रास्ता भर है: जीने का शौक पैदा करती है दुआ,और बदलने की जुस्तुजू .
खलील जिब्रान ने अपनी कहानी "खलील द हेरिटेज "में दुआ की थी
ए मुक्ति !हमारे ऊपर रहम  खाओ और हमारी फरयाद सुनो !नील नदी के उद्गम से लेकर फिरत नदी के मुहाने तक
के तमाम लोगो की फर्यादे,और दर्द में डूबी चीखें तुम तक पहुच रही हैं .दिव्प से लेकर लेबनान तक सभी तुम्हारे तरफ अपने कांपते हुए हाँथ कुछ इस तरह  बढ़ा रहे हैं !जैसे लोग आखेई साँसे गिन रहें है !फारस की कड़ी के किनारे से रेगिस्तान की सरहद तक ग़म में डूबे हुए लोगो की आँखे तुम्हारी तरफ उठ रहीं है "

कुछ अनुभव ऐसे होते हैं

 कुछ अनुभव ऐसे होते हैं
या यूँ कहें की बहुत कम अनुभव ऐसे होते हैं
जिन्हें हम कभी भी पूरी तरह
व्यक्त कर पाने में समर्थ नहीं होपाते हैं
ये अनुभव अपनी आधी अधूरी
ज़िन्दगी के साथ ,हमारे अन्दर
किसी मुकम्मल अनुभव की तरह रहने लगते हैं
आधा-अधूरा अविस्मर्णीय
आनंदमयी और अवसादपूर्ण
होने के साथ साथ
ये चिरायु भी होते हैं
और मेरे साथ दुर्भाग्य या भाग्य से
ये अनुभव कुछ से थोड़े ज़यादा हैं 

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मेरे पास चीज़े चीज़े मेरे पास .

i thought between my packing how many thing i have in my life. to put in my bag.
चीज़े मेरे पास ;
मेरे पास चीज़े !
कुछ कमीज़ एक पेन
एक बक्सा !
एक नोटबुक
कुछ तथाकथित विचारवादी पुस्तकें !
दो चार या ज़यादा यादें
देल्ली के कुछ खंडहर
एक शाम मुंबई की
कुछ दिन अपने गाँव के
कुछ प्रेम पत्र,खुद के लिखे
दो लोगो के चेहरे बिलकुल सपाट
फूटपाथ की तरह
एक लड़की कुछ भोली सी ,कुछ गुमसुम सी
कुछ कडवे एहसास
कुछ मीठे एहसास
मेरे पास चीज़े
चीज़े मेरे पास .

अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !

"उम्मीद " वसे तो इस लफ्ज़ को ही गलत मानता हूँ मै! क्यूंकि सही लफ्ज़ है "चाहत"और अगर इसको इसी तरह सही करते जाएँ तो बनेगा "तमन्ना " "आरजू " "ख्वाहिश" और उसके आगे लगाना पड़ेगा मेरी ! और तब जाके मतलब बनेगें !
                       मेरी ख्वाहिश है की ऐसा होजाए ,तीन दिन से ऐसा सोच रहा हूँ !और दुआ भी कर रहा हूँ !अब जब एक शख्श कहीं दिल के एक छोटे से गोशे से भी दुआ मांगता है तो उससे ईमान की सनद मांगना बेवकूफी ही होगी,
अगर उसने अपने दिल में दुआ की तो उसने क्या सोच होगा -?
                         आलम बाखबर ने दो बार पेंसिल उठाया कागज़ तक लगाया और वापिस रख दिया !उसको यकीन है की वो पेंसिल अब हमेशा उसके पास रहेगी अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !


रविवार, 4 दिसंबर 2011

वही इन्केलाब में काम आयेगा !

 खामोश होके लड़ना बड़ा मुश्किल होता है !और हार भी तै है फिर चाहे आपके तरकश में जितने भी तीर हो ,जब आप उसे चलाये हे नहीं !पर मेरे पास तो लफ्जों के तीर भी कम हैं !बड़ी मुश्किल से एक दो लोगो से कुछ कह्पने की हिम्मत कभी कभी की तो ऐसी मुह की खाई की बस पुचो मत !

लेकिन सुनये तो जनाब मै तो ये कह रहा हूँ की अगर आप के पास ये फन नाहे तो इसका मतलब ये नहीं है की आप इन्केलाब नहीं लासकते ! उठए देखिये कोई तो एक ऐसा फन है आपमें जो सबसे अलग भगवन ने आपको दिया है वही इन्केलाब में काम आयेगा !

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

,अभी तो बस जंग के ख़त्म होने की दुआ कर रहा हूँ !

कल या कल के पहले कभी तुमने इतनी गंभीरता से पहले नहीं सोचा होगा ,पर अब सोचना अगर तुम मेरी महबूबा हो तो क्या बात है की मैं जंगलो में जाना चाहता हूँ !क्यं मै जाना चाहता हूँ उस बस्ती में जहाँ काली छाया
रहती है !बस क्यूँ दुनया से लड़ने में ही शहीद होजाना चाहता हूँ मै!जीत की अकंछा क्यं नहीं पाली मैंने ! मै क्यूँ चाहता हूँ की जिन रास्तो पर चलूं वहां सिर्फ रेत ही रेत हो दोपहर के सूरज से गर्म और मै नंगे पांव उसमे उतर के भटक जाऊ !जंग इतनी सख्त तो नहीं है !आज और आज के बाद इस बारे में ज़रूर सोचना !तबतक मै फिर तुम्हारे सपने में आने की कोशिश करूँगा ज़िन्दगी ,अभी तो बस जंग के ख़त्म होने की दुआ कर रहा हूँ !

बुधवार, 16 नवंबर 2011


                       kabhi kabhi vicharo ka itna bada tufaan
                                   mann me ghumad raha hota hai
    ki lagta hai likhne baithunga to upannyas ban jayega
         par kavita ban ke panne me simatne walevichaar
                                                     bahut kam aate hai
bas tabhi jab mujhe apne aap se milne ki fursat hoti hai

रविवार, 13 नवंबर 2011

मै भूल गया

 मै भूल गया ........

और कहाँ कहाँ सहूँ
बस अब तो आज़ाद होना चाहता हूँ
और आज़ाद होके
अपने घर पे रहना चाहता हूँ
बहुत बहुत बंधा हूँ
मै भीड़ में,लोगों ने चारो तरफ बंधा है
और मै दुनिया की कई ज़बाने जानने लगा
और मेरी महबूबा के इशारे मै भूल गया
मैंने मिस्र से लेकर शुंग तक
इतिहास को खंगाला
मुझे मुग़लकाल के शाही फरमान ताजिंदगी याद रहेंगे
पर ये कासिद ख़त किस का लाया
बताओ,
कितनी अजीब जुबान है
कुस्तुन्तुनिया के जंगल
बरमूडा के दीप पर उंगलियाँ अकस्मात ही पहुच जाती है
और ग्लोब मेरे इशारे पर घूम जाता है
वोह पत्थर की सीट
किस जगह पर थी कुछ याद सा नहीं
समंदर का वोह किनारा
किस जगह पर था कुछ याद सा नहीं
इस सहर के हर अखबार और टेलीविज़न के
जर्नलिस्ट मुझे जानते हैं
मै हर पेपर में सुबह दिख ही जाता हूँ
जो बड़ी सड़कों के किनारे
लगे रहते हैं
लेकिन पुराने घर की वो गलियां
वोह जिस के सर फिरे आशिक़
कुचे यार कहते हैं वोह मुझे नहीं मालूम
दिन में समिनारो से लौटते वक़्त
मेरा दिमाग दिल को बहुत फटकारता है
तुम ने कितने दिन बर्बाद किया
कितना कीमती वक़्त यूँ ही किसी के इन्तेज़ार में
और अब दिल के पास
दलीलें ख़तम हो गईं
और रात के तीसरे पहर सिर्फ ये दिअरी
ही दिलासे दे सकती है
सुबह तो होगी लेकिन किसी माहपारा के रास्ते में
खड़ा होने की जल्दी नहीं है




















किसी ने हाल पुछा तो रो दिया वो भी

 नया नया था हमें भी जुनूं परश्तिश का
बना हुआ था सरे अंजुमन खुदा वो भी
मेरी तरह वो भी उदास था सरे महफ़िल
किसी ने हाल पुछा तो रो दिया वो भी 

Basant ya patjhad jo beet gaya


Patte ; har shaakh par abhi nahi uge
Har ped se gire bhi nahi abhe patte;
Basant kuch khatm nahi hua:
Lekin kashmaksh jaari hai;
Wo kya hai,jo andar bacha hai
Basant ya patjhad jo beet gaya
Wo kyat hai Sirf ek mausam
Patte shaakh par hai abhi
Pata nahi ugte hue ya girte hue

शनिवार, 12 नवंबर 2011

ham sabhi zakhm rafu kar baithe


kya kaha aag lagi hai dil men
ye to maghrib ka waqt hai bhai
sheikh sahib to wazu kar baithe

tum na karna wafadi hamse
muhabbat ye sochkar nahi ki
ham faqat aarzu si kar baithe

jalwa-e-husn ko mastur he rahne dete
aankh mahmil se hi bahel jaati
tum hi aaina ru kar baithe

tumko kyat um to lahu pee loge
shekh sahib bhi jannati thare
ham hi pagal the saaqi ko adu kar baithe

ab to odhenge aur bechaange
ye zindagi ka hamara sarmaya
ham muhabbat ko aarzu kar baithe

dost aaye koi ahbaab aaye
teer dushman ke kitne kachche the
ham sabhi zakhm rafu kar baithe

shorishe dunya se dil oob gaya hai
ya jaza hamkalam ho ya rab
ya kaza guftugu kar baithe

mai bhi dua maang sakta hun


Mai sochta hun; mai bhi dua maang sakta hun
Mang sakta hun
Mujhe sukun de de;
Bahut bada hai ye moti ikram karde
Mai bhi maangu kabhi,
Koi lamha subh-e-visaal ka;
Kisi sangdil sanam ki murawwaten;
Kabhi apne gham ko bhool Kar
Tujhse maangu hazaar massrrate
Aur kuch dayra badhakar
Dunya ka sukun maang lun
Sabhi bekaso ki rahaten
Sabhi mufliso ko ishraten.
Bhook se na mare koi,
Aur zulm se rahaten:
Ahle sidak ki mazaar par;
Maangun buzurgo ki jannaten
Kabhi rahem maangu jaza ki;
roze kayamaten; lekin
use badi meri dua hai ye
mere khuda muyjhe bakhsh de
KUCH YAKEEN KI ALAMATEN

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर काम से लौटकर घर आना
सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना
सबसे खतरनाक वह घडी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो आपकी निगाह में रुकी होती है
सबसे खतनाक वह चाँद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आंगनों में चढ़ता है
पर आपकी आँखों को मिर्ची की तरह नहीं गड़ता है
सबसे खतनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहूँचने के लिए जो मरसिए पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाजों पर जो गुंडे की तरह अकड़ता है
सबसे खतरनाक वह दिन होती है
जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धुप का टुकड़ा आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए -अवतार सिंह पाश

शुक्रवार, 24 जून 2011

वली दखनी

याद करना हर घड़ी उस यार का
है वजीफा मुझ दिल-ए-बीमार का
(vazeefa=repeating incantation)

आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं
तिशना लब हूँ शरबत-ए-दीदार का

आकबत क्या होवेगा? मालूम नहीं
दिल हुआ है मुब्तिला दिलदार का

क्या कहे तारीफ़-ए-दिल है बे-नज़ीर
हर्फ़ हर्फ़ उस मखजन-ए-इसरार का

ए वली होना श्री जन पर निसार
मुद्दा है चश्म-ए-गौहर-बार का

वली दकनी

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम को आब आहिस्ता आहिसता
की आतिश गुल को करती है ग़ुलाब गुल-आब आहिस्ता आहिसता

अजब कुछ लुत्फ़ रख़ता है शब्-ए-ख़िल्वत मे दिलबर सों
सवाद सवाल आहिस्ता आहिस्ता, जव़ाब आहिस्ता आहिसता

मेरे दिल को किया बेख़ुद तेरी अँखियाँ ने आख़िर कों
के ज्यों जूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिसता

अदा-ओ-नाज़ सो आता है वो रोशन-जबीं घर सों
की ज्यों जूँ मशरिक़ से निकले आफ़ताब आहिस्ता आहिसता
“वली” मुझ दिल मे आता है ख़याल-ए-यार बे-परवाह
के ज्यूँ अँखियाँ मले आता है ख़ाब आहिस्ता आहिसता

सोमवार, 13 जून 2011

कहाँ खो गए तुम ,ए मेरे ख़वाब !!

ए मेरे ख़वाब !!
कहाँ खो गए तुम 
याद है मुझको जब तुमने मुझसे कहा था, 
तुम तन्हा नहीं  हो
दुनया क्या सोचती है ये मत सोचो  
तुम्हारी जुस्तुजू तुम्हारे साथ है 
मुझे जीने का हुनर तुमने सिखाया
मंजिलों तक पहुँचने का रास्ता बता कर 
फिर आज क्यूँ तुम मुझसे बिछड़ गए  ?
तुम्हारी दुआओ से मंजिल मिल गयी मुझको 
लेकिन तुम मेरे ख्वाब !
तुम कहाँ खो गए ?

ऐ मेरे हुसैन ! (A tribute to M.F HUSAIN)

ऐ मेरे हुसैन !
तुम्हारे शफ्फाक कनवास पर जो रंग है ,
उनमे ये रंग क्या ज़रूरी था 
जिनमे  हर सियाह रंग वाले ,हरे, केसरया झंडो वाले,
लहू के रंग धुलते हैं 
ऐ मेरे हुसैन !
तुम्हारी स्केच बुक में ;जिसमे परतो में आड़ी-तिरछी रेखाए होती हैं 
क्या ये रेखाए भी ज़रूरी थीं 
जिनसे खद्दर और खाकी वाले ज़मीन पर रेखाएं बनाते है 
और उनको दिलो में पेवस्त कर देते है ........

शनिवार, 11 जून 2011

कबतक बम बनवाते रहोगे आदम ,,,

क्या हमेश खुश ख्याल रहोगे आदम 
कबतक प्यार को फूल, रोटी को खुशामद और क्रांति  को रेस्टारेंट कहोगे.
बढ़ के इब्लीस को क्यं नहीं बताते,
मेरे बच्चे बारूद नाहे खाते 
 कबतक बम बनवाते रहोगे आदम ,,,



शुक्रवार, 10 जून 2011

बहुत ज़रूरी जीने के लिए

रोक लो .. गर सके जाने न दो 
जाने वाले फिर लौट कर आते नहीं ...
और जाने वाला मई नही
तुम्हारा माजी ......
या सिर्फ दिल्लगी ,वो तुम्हारे जिस्म का एक हिस्सा 
बहुत ज़रूरी जीने के लिए

बुधवार, 8 जून 2011

वक़्त के कैलेण्डर से पिघल कर ....

गुलशन में झिझका गुल 
पूरी तरह बंधा भरा मन 
न बर्फ न रौशनी की दस्तक.........
सुबह की आहट :
वक़्त के कैलेण्डर से पिघल कर ....
मुहब्बत के वक़्त में जाती हुई रात की इबारत में
शयेद एक नया नुक्ता गिरने गिरने को है 
ऐसे वक़्त में मेरी जान !
मै अपने अश्क को इश्क करना चाहता हूँ 
मै आँख बंद करता हूँ चली आओ 
मेरी ज़िन्दगी की रहो को रोशन करने वाली "निशा"

गुलज़ार की इक नज़्म

मुझे अफ़सोस है सोनां
कि मेरी नज़्म से होकर गुज़रते वक्त बारिश में
परेशानी हुई तुमको
बड़े बेवक्त आते हैं यहां सावन
मेरी नज़्मों की गलियां यों भी अक्सर भीगी रहती है
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है
अगर पांव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है

मुझे अफ़सोस है लेकिन-
परेशानी हुई तुमको कि मेरी नज़्म में कुछ रोशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीजों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाख़ून कितने बार टूटे हैं-
हुई मुद्दत कि चैराहे पे अब बिजली का खंभा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुमको-
मुझे अफ़सोस है सचमुच!


भवंर से डरा हुआ , और किनारों से सहमा हुआ

मै एक अधुरा सच , या सच के समुन्दर की एक बूँद.
गुनाह के पत्थरो पे सूखती सी ,..हर पल निरंतर 
मै एक अनदेखा ख्वाब 
या नींद के साये में ख्वाब के टुकड़े ..पलकों में जम सा गया है
हर पल गिरता हुआ
मै इक छोटी सी तमन्ना .....
या आस का इक  टुकड़ा छोटा सा ,ज़िन्दगी जीने के लिए ज़रूरी सा इक एक एहसास
मै इक छोटी सी कश्ती
वक़्त के दरिया में ....बेवजह बहता हुआ
भवंर से डरा हुआ , और किनारों से   सहमा हुआ


शुक्रवार, 27 मई 2011

आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है

दुनिया में काम करने के लिए आदमी को अपने ही भीतर मरना पड़ता है. आदमी इस दुनिया में सिर्फ़ ख़ुश होने नहीं आया है. वह ऐसे ही ईमानदार बनने को भी नहीं आया है. वह पूरी मानवता के लिए महान चीज़ें बनाने के लिए आया है. वह उदारता प्राप्त करने को आया है. वह उस बेहूदगी को पार करने आया है जिस में ज़्यादातर लोगों का अस्तित्व घिसटता रहता है.

(विन्सेन्ट वान गॉग की जीवनी 'लस्ट फ़ॉर लाइफ़' से)

गुरुवार, 26 मई 2011

उतर जाए छाती

उतर जाए छाती में जिगरवा काट डाले है
मुई महंगाई ऐसी है ,छरी बरछी कटारी है

गुरुवार, 19 मई 2011

musavvir ka inkeshaf hu mai

manazir ki dilkashi,musavvir ka inkeshaf hu mai
ibteda inteha k darmiyan,mukhtasar sawal hu mai.

maukuf hasraton k darmiyan,khyalon ki talabgar hu mai.
zeest k roshni k muqabil ,na bahaut door na bahaut pas hu mai

bahaut dino se tere pas hu mai.phir tu bata kyu udas hu mai.

गुरुवार, 12 मई 2011

'Mir' un nim-baz ankhon main

hasti apni hubab ki si hai
ye numaish sarab ki si hai

nazuki us k lab ki kya kahiye
pankhari ik gulab ki si hai

bar bar us k dar pe jata hun
halat ab iztirab ki si hai

main jo bola kaha k ye awaz
usi khana-kharab ki si hai

'Mir' un nim-baz ankhon main
sari masti sharab ki si hai

बुधवार, 11 मई 2011

कैफ़ी आज़मी --ek ghazal

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े


इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े


साकी सभी को है गम-ए-तिश्न: लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पडे


मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

मंगलवार, 10 मई 2011

inkeshaf alam: मस्जिद में धमाका मामले में इंद्रेश से पूछताछ

inkeshaf alam: मस्जिद में धमाका मामले में इंद्रेश से पूछताछ

inkeshaf alam: सरकार कि अदालत,अदालत कि सरकार

inkeshaf alam: सरकार कि अदालत,अदालत कि सरकार

inkeshaf alam: who refuse that a hindu cant do a terrorist conspiracy

inkeshaf alam: who refuse that a hindu cant do a terrorist conspiracy

inkeshaf alam: kuch badal se gayae

inkeshaf alam: kuch badal se gayae

inkeshaf alam: फैज़

inkeshaf alam: फैज़

inkeshaf alam: why why why

inkeshaf alam: why why why

inkeshaf alam: इसी शहर में आसानी से (jessica lal case study)

inkeshaf alam: इसी शहर में आसानी से (jessica lal case study)

inkeshaf alam: रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

inkeshaf alam: रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

रूमी की एक नज़्म का अनुवाद

ईसाई नहीं। यहूदी या मुस्लिम नहीं।
हिंदू, बौद्ध, सूफी या जेन भी नहीं।

न किसी धार्मिक-सांस्कृतिक प्रणाली के तहत।
मैं न पूर्व से आया न पश्चिम से।
न समुद्र से निकला न उगा धरती पर।

न लौकिक, न अलौकिक।
किसी भी तत्व से
निर्मित नहीं हुआ मैं।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
मैं न इस लोक का न परलोक का।
न आदम और हव्वा की संतान।
न सृष्टि की उत्पत्ति की
किसी कहानी की उपज।
मेरी कोई जगह नहीं
कहीं कोई निशान नहीं।
मैं जानता हूं तो केवल अपने प्रिय को।
मैंने दो दुनिया को एक की तरह देखा है।
और वह एक दुनिया पुकारती है
प्रथम, अंतिम, बाहरी, भीतरी,
केवल एक सांस को

सांस लेते इंसान को।

शनिवार, 7 मई 2011

गुलज़ार

नींद की चादर चीर के बाहर निकला था मै ,
आधी रात एक फोन बजा था....

दूर किसी मोहूम सिरे से
इक अनंजान आवाज ने छूकर पूछा था
आप ही वो शायर है जिसने
अपनी कुछ नज्मे सोना के नाम लिखी है
मेरा नाम भी सोना हो तो ?

इक पतली सी झिल्ली जैसी ख़ामोशी का लम्बा वक्फा
मेरे नाम इक नज़्म लिखो ना !
मुझको एक छोटे से शेर में सी दो ,
"अंजल "लिखना
शायद मेरी आखरी शब् है
आखिरी ख्वाहिश है ,मै आप को सौप के जायूं?"
फोन बुझाकर
धज्जी धज्जी नींद में फिर जा लेटा था मै !

अंजल !
इसके बहुत दिनों बाद मालूम हुआ था
दर्द से दर्द बुझाने की इक कोशिश में तुम
केंसर की उस आग में मेरी नज्मे छिड़का करती थी .....

नींद भरी वो रात कभी याद आये तो
अब भी ऐसा होता है
एक धुआ सा आँखों में भर जाता है 

"गुलज़ार "

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

Reliance Communications Ltd, Reliance Center,

TO
Mr. Mr. Anuj Bahuguna
Reliance Communications Ltd,
Reliance Center,
Maharaja Ranjit Singh Marg,
New Delhi -110002.

respected sir
I am Inkeshaf alam a frustrated customer of Reliance GSM (GSM No- 8882026951) service since last 8 months.

On yesterday  Rs. 26  has been auto deducted from my balance for 1 Paisa SMS Pack. But I had already did with an easy recharge of Rs. 26.i called customer care today and that is such second  bad experience with reliance GSM services.
first time i did a easy recharge of Rs. 79 and they told me that amount was collapsd.and now again they told me the same.
dear sir the question is:-
1-why and how any customers money be collapsed.
2-Who is giving authority to you to deduct money from customers account with our any approval from end customer side.
3- from which rule of TRAI this collapse was done.

I called tow  times today they hanged me at waiting for long 34 mnt   customer care was unable to solve the problem.they refuse to write my complain just passing the call to one person to another.
kindly provide me with some appropriate decision so that the problem get solved and i can get the recovery for my complete lost amount of money.




and also give me the reason why should i don't go to consumer  Cort for the same because this is not only mine problem but thousands of customers suffers of this unlawful rule of collapse of money.

So I am Requesting you to look on this matter and resolve the problems.

Thanks & Regard
inkeshaf alam
 





शनिवार, 16 अप्रैल 2011

एक शेर

उस अफसाना निगार के नाम जिसने फिर कल रात कहानी को 
हादसा लिखा 
"कहानी खत्म  हुई तो मुझे   ये ख्याल आया 
तेरे सिवा भी तो और भी किरदार थे  कहानी में" 



शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

why why why

they are actually sick kuch kitaben padh kar char baaten karke they think that they know

the islslaam and they think that they are so strong  in theire  knowledge nobody in the

world;i mean yaar this is a kind of joke that u r cursing the science with the help with

scince. i knew only one thing if media (chennel means of communication) is wrong then

shurly the masseg will also.
matlab yaar aap facebook kyn use kar rahen hain yaar apni yaa islaam ki socalled scince ki

burai karne ke liye;
mera manna sirf itna hai ki scince muhtaj hai proof hone ke liye islaam ki na ki islaam

scince ka,lekin scince ke bina life,boss go and check out the difination of scince'.in

every bit of life there is scince,

mai nahi manta boss agar allah rabbul izzat ko mana karna hota to talwar se lekar ghar thak

aur alloy se leke needle tak sab kuch mana aur haram hota,lekin nahi hai,

what you understood about the hadees"agar ilm hasil karne ke liye tumhe cheen jana pade to

jao"
to allah ke rasul (peace be upon him) ne kiss ilm ki baat kari quran to wahin par tha

hadees to wahin par thi arebic to waqhin par thi,are boss simpal hai har insan ko sikhna

hai har tarah ka ilm,scince ki koi mumaniat nahi nahi nahi hai,
and i will imediatly leave all the scince inventions just give me a singal surah or hadees

pointing out abt it,

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

फैज़

फैज़ अहमद फैज़ : शब और सहर का शायर



उन्होंने परम्परा से केवल उतना ही हटाने की कोशिश की है जितना अपने विचारों को प्रकट करने के लिए आवश्यक समझा है.
सैयद एहतेशाम हुसैन


फैज़ एशिया के प्रतिनिधि कवि हैं.  अपने देश और अन्य देशों की जन-विरोधी सत्ता का विरोधी एक निर्वासित कवि. भाषा के घर में रहने वाला एक यायावर. एक ऐसा प्रगतिशील शायर जिसने कविता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन अपनी आखरी पंक्ति तक किया. उसके मेयार और हुस्न का आशिक.  फैज़ की काव्य-यात्रा उपनिवेश और नवजागरण की संधिवेला से प्रारम्भ होती है. यह निशीथ और अरुणोदय का समय एक साथ है. शब साम्राजवाद और परम्परा की रूढियों का, सहर नई चेतना और स्वाधीनता की आकांक्षा का.

उर्दू कविता अपने आभिजात्य और अंदाज़े-बयां के लिए जानी जाती है. उसकी प्रतीकात्मकता और सम्बोधन की क्षमता ने उसे मकबूल बनाया है. आशिक और महबूब की शीरीं गुफ्तगूं में ज़ाहिर है आपबीती अधिक है. जगबीती कहीं है भी तो आपबीती के ही संदर्भ में. इस गुफ्तगूं का केन्द्र इश्क है – सूफियाना, रहस्यवादी इश्क. जहां वस्ल से अधिक हिज्र को तरजीह दी जाती है. प्रसिद्ध आलोचक कलीमुद्दीन अहमद ने, ‘उर्दू –शायरी पर एक नज़र’ में लिखा है-

हाँ, यदि कुछ कमी (उर्दू –शायरी) है भी तो संसार-निरीक्षण की. उनकी आँखे दिल की ओर देखती हैं, वे सदा दिली जज्बात वो भावों की सैर में निमग्न रहती हैं. यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे संसार की बहुरंगी से नितान्त अनभिज्ञ हैं; किन्तु इतनी बात अवश्य है कि इस बहुरंगी की ओर उनका ध्यान नहीं है”.


फैज़ इश्क और हुस्न को उसकी शास्त्रीयता में देखते जरूर हैं पर उसे रहस्यवादी रुमानियत से निकाल कर रोज़-ब-रोज़ के जीवन से जोड़ देते हैं. यह इश्क इंसानी है- शरीरी और ऐन्द्रिक. यह आदम का वह प्रेम है जिसके दीगर मसाइल भी हैं. गमें-जाना के साथ ही साथ गमें-रोज़गार भी है. जा-ब-जा बिकते हुए ज़िस्म औ जाँ पर उसकी सोचती हुई नज़र ठहर जाती है. जुल्म और सितम उसे कुछ और सोचने पर विवश करते हैं. वस्ल की राहत के सिवा वह कहीं और भी राहत ढूंढता है. यह वह नवजागरणकालीन नवयुवक है जो समय और समाज में हो रहे परिवर्तन से अपने को जोड़ने की कोशिश कर रहा है. यहाँ इश्क की हेठी नही है, न महबूब का तिरस्कार. उसका हुस्न अभी भी दिलकश है और उसकी आँखों के सिवाय दुनिया में कुछ रखा नही है. वह बहुत कुछ है पर सबकुछ नही. हुस्न और इश्क उसे समाज से काटते नहीं, जोड़ते हैं. उसकी संवेदनशीलता में इज़ाफा करते हैं. जिस पेशानी, रुखसार, होंठ पर कभी वह जिंदगी लुटाने की बात कहता था वहीं  से अब वह सर्द-आहों और जर्द-चेहरों के मानी तलाशता है. अब उसे बाज़ार में बिकते हुए मजदूरों के गोश्त दिखते हैं और राजपथ पर बहता हुआ गरीबों का लहू. फैज़ की शायरी नातवानों के निवालों पर झपटने वाले उकाब से उलझती है. स्त्री–पुरूष के रिश्ते आशिक और महबूब के रिश्तों की कैद से बाहर भी निकलते हैं. वस्ल और फिराक से परे भी इनके बीच कुछ है. बराबरी पर एक दोस्ती का पता मिलता है इन गज़लों में. मर्द-औरत की रवायती समझ से आगे की राह है फैज़ में.

फैज़ ने १९२९ से ही नज्म लिखना शुरू कर दिया था. उनका पहला कविता संग्रह ‘नक्शे–फरियादी १९४१ में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में उनकी एक नज्म का शीर्षक है – मौज़ू-ए-सुखन’. इसमें कविता सम्बन्धी उनके विचार हैं. देश की आज़ादी से पहले फैज़ की शायरी में  रवायत और नवजागरणकालीन विचारों का समन्वय हैं.

अपने अफकार की अशआर की दुनिया है यही
जान-ए-मजूमूँ है यही शाहिद-ए-माना है यही.

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

सोमवार, 24 जनवरी 2011

The activists damage signage at Yadgir Railway Station

 और ऐसा क्यं किया भाई उन्होंने ये भी तो सुन लो एक बोर्ड लगा था उर्दू में याद रखने कि बात है कि साथ में हिंदी इंग्लिश में भी था /लेकिन जी ये रास्ट्र भक्त लोग है रास्ट्र कि संपत्ति पर कुछ हक है कि नहीं : सो तोड़ डाला : अभी तो बहुत दूर जाना है : इन्ही और बीजेपी की यात्रा का इतिहास ! कितने दंगो और अराजकता से भरा हुआ होता है ये तो सभी जानते है. अरे अडवानी जी RSS
के मुद्दों को भी देख लिया करो कभी कभी.THEY R MAKING TERRERIST.देश का दयां हटाने के लिए इस मुद्दे से आप को कोई और अच्चा मुद्दा नहीं मिला.

शनिवार, 15 जनवरी 2011

kuch badal se gayae

mai apne aap se badhkar kisi ko kyun chahun
mujhi pe khatam hai kissa meri muhabbat ka

शनिवार, 8 जनवरी 2011

who refuse that a hindu cant do a terrorist conspiracy

 In what can come out to be a big embarrassment for RSS, Swami Aseemanand, through his confessions has turned the spotlight squarely on three people: murdered expelled RSS pracharak Sunil Joshi, jailed Sadhvi Pragya Thakur, and RSS executive member Indresh Kumar.
While Sadhvi Pragya Thakur has been jailed Thakur for her alleged involvement in the Malegaon blasts, Indresh Kumar’s name has figured in the charge sheet filed by Rajasthan ATS in Ajmer blasts.
But the most embarrassing revelation for the RSS is Aseemanand's confession about Sunil Joshi and Indresh Kumar.
In the disclosure he says: “In 2005, Indresh had come to Shabri Dhaam after an RSS function. He was accompanied by several top RSS functionaries. Sunil Joshi was also there. Indresh ji met all of us. He told me that making a bomb is not my job. I have been instructed by the RSS to work within the tribals. He said Sunil Joshi had been given the task of bombs. He said whatever help Sunil needs, we will provide.”
Aseemanand further says: “I had also got to know that Sunil Joshi and Bharatbhai had met Indresh Ji in Nagpur and Indresh ji had given a sum of Rs 50,000 to Sunil in Bharatbhai's presence. Col Purohit had once told me that Indresh ji was an ISI agent and that he had all documents to prove his point. But he never showed me those documents.”
But when Indresh ji himself was summoned by the CBI in December for questioning about his alleged connections, he had outrightly denied everything.
“I condemn all allegations against me. They are not only politically motivated but smack of a political conspiracy”, Indresh Kumar had told the newsmen.
Sunil Joshi himself was murdered in broad daylight in December 2007 in Dewas in Madhya Pradesh. This is what Aseemanand says about Joshi in the confession report:
"Sunil Joshi told me that the blasts at Ajmer were carried out by his men. He said that he was given Muslims for this job by Indresh ji. I cautioned Joshi that if you took men from Indresh ji, then whenever you get caught, his name will also crop up. I told him that there was a threat to his life from Indresh.”
Sunil Joshi's murder case has been solved just last month by the MP Police, that too after first closing the investigation and then reopening it under immense pressure. The police had attributed the motive of personal rivalry between Joshi and his alleged killers, who were also staying with him. Aseemanad's disclosure now points to loopholes in the police theory as well.