रविवार, 13 नवंबर 2011

मै भूल गया

 मै भूल गया ........

और कहाँ कहाँ सहूँ
बस अब तो आज़ाद होना चाहता हूँ
और आज़ाद होके
अपने घर पे रहना चाहता हूँ
बहुत बहुत बंधा हूँ
मै भीड़ में,लोगों ने चारो तरफ बंधा है
और मै दुनिया की कई ज़बाने जानने लगा
और मेरी महबूबा के इशारे मै भूल गया
मैंने मिस्र से लेकर शुंग तक
इतिहास को खंगाला
मुझे मुग़लकाल के शाही फरमान ताजिंदगी याद रहेंगे
पर ये कासिद ख़त किस का लाया
बताओ,
कितनी अजीब जुबान है
कुस्तुन्तुनिया के जंगल
बरमूडा के दीप पर उंगलियाँ अकस्मात ही पहुच जाती है
और ग्लोब मेरे इशारे पर घूम जाता है
वोह पत्थर की सीट
किस जगह पर थी कुछ याद सा नहीं
समंदर का वोह किनारा
किस जगह पर था कुछ याद सा नहीं
इस सहर के हर अखबार और टेलीविज़न के
जर्नलिस्ट मुझे जानते हैं
मै हर पेपर में सुबह दिख ही जाता हूँ
जो बड़ी सड़कों के किनारे
लगे रहते हैं
लेकिन पुराने घर की वो गलियां
वोह जिस के सर फिरे आशिक़
कुचे यार कहते हैं वोह मुझे नहीं मालूम
दिन में समिनारो से लौटते वक़्त
मेरा दिमाग दिल को बहुत फटकारता है
तुम ने कितने दिन बर्बाद किया
कितना कीमती वक़्त यूँ ही किसी के इन्तेज़ार में
और अब दिल के पास
दलीलें ख़तम हो गईं
और रात के तीसरे पहर सिर्फ ये दिअरी
ही दिलासे दे सकती है
सुबह तो होगी लेकिन किसी माहपारा के रास्ते में
खड़ा होने की जल्दी नहीं है




















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