मेरी मेज़ पर मेरी ही तस्वीर है
मै अक्सर अपने आप से ही सवाल करता हूँ
की मै क्यूँ अपने इल्म को बांटने के लिए;
इतने दर्द सहता हूँ
ख़ामोशी का मज़ा बांटने के लिए;
मुझे और कितना चीखना पड़ेगा
और तन्हाई को समझाने के लिए;
कबतक भीड़ में रहूँ मै;
लोगो के मुखौटे उतरने के लिए,
अपने चेहरे को कितना छीलूं
यूँ जैसे बहरो की बस्ती में गाना पड़े
और अन्धो के मोहल्ले में नाचना
मेरी तस्वीर मुस्कुराती रहती है
और कितना वक़्त लगेगा
बातो की ख़ामोशी सुनने में
और ख़ामोशी की बातें......
मै अक्सर अपने आप से ही सवाल करता हूँ
की मै क्यूँ अपने इल्म को बांटने के लिए;
इतने दर्द सहता हूँ
ख़ामोशी का मज़ा बांटने के लिए;
मुझे और कितना चीखना पड़ेगा
और तन्हाई को समझाने के लिए;
कबतक भीड़ में रहूँ मै;
लोगो के मुखौटे उतरने के लिए,
अपने चेहरे को कितना छीलूं
यूँ जैसे बहरो की बस्ती में गाना पड़े
और अन्धो के मोहल्ले में नाचना
मेरी तस्वीर मुस्कुराती रहती है
और कितना वक़्त लगेगा
बातो की ख़ामोशी सुनने में
और ख़ामोशी की बातें......
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