kabhi kabhi vicharo ka itna bada tufaan
mann me ghumad raha hota hai
ki lagta hai likhne baithunga to upannyas ban jayega
par kavita ban ke panne me simatne walevichaar
bahut kam aate hai
bas tabhi jab mujhe apne aap se milne ki fursat hoti hai
और कहाँ कहाँ सहूँ
बस अब तो आज़ाद होना चाहता हूँ
और आज़ाद होके
अपने घर पे रहना चाहता हूँ
बहुत बहुत बंधा हूँ
मै भीड़ में,लोगों ने चारो तरफ बंधा है
और मै दुनिया की कई ज़बाने जानने लगा
और मेरी महबूबा के इशारे मै भूल गया
मैंने मिस्र से लेकर शुंग तक
इतिहास को खंगाला
मुझे मुग़लकाल के शाही फरमान ताजिंदगी याद रहेंगे
पर ये कासिद ख़त किस का लाया
बताओ,
कितनी अजीब जुबान है
कुस्तुन्तुनिया के जंगल
बरमूडा के दीप पर उंगलियाँ अकस्मात ही पहुच जाती है
और ग्लोब मेरे इशारे पर घूम जाता है
वोह पत्थर की सीट
किस जगह पर थी कुछ याद सा नहीं
समंदर का वोह किनारा
किस जगह पर था कुछ याद सा नहीं
इस सहर के हर अखबार और टेलीविज़न के
जर्नलिस्ट मुझे जानते हैं
मै हर पेपर में सुबह दिख ही जाता हूँ
जो बड़ी सड़कों के किनारे
लगे रहते हैं
लेकिन पुराने घर की वो गलियां
वोह जिस के सर फिरे आशिक़
कुचे यार कहते हैं वोह मुझे नहीं मालूम
दिन में समिनारो से लौटते वक़्त
मेरा दिमाग दिल को बहुत फटकारता है
तुम ने कितने दिन बर्बाद किया
कितना कीमती वक़्त यूँ ही किसी के इन्तेज़ार में
और अब दिल के पास
दलीलें ख़तम हो गईं
और रात के तीसरे पहर सिर्फ ये दिअरी
ही दिलासे दे सकती है
सुबह तो होगी लेकिन किसी माहपारा के रास्ते में
खड़ा होने की जल्दी नहीं है