शुक्रवार, 24 जून 2011

वली दखनी

याद करना हर घड़ी उस यार का
है वजीफा मुझ दिल-ए-बीमार का
(vazeefa=repeating incantation)

आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं
तिशना लब हूँ शरबत-ए-दीदार का

आकबत क्या होवेगा? मालूम नहीं
दिल हुआ है मुब्तिला दिलदार का

क्या कहे तारीफ़-ए-दिल है बे-नज़ीर
हर्फ़ हर्फ़ उस मखजन-ए-इसरार का

ए वली होना श्री जन पर निसार
मुद्दा है चश्म-ए-गौहर-बार का

वली दकनी

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम को आब आहिस्ता आहिसता
की आतिश गुल को करती है ग़ुलाब गुल-आब आहिस्ता आहिसता

अजब कुछ लुत्फ़ रख़ता है शब्-ए-ख़िल्वत मे दिलबर सों
सवाद सवाल आहिस्ता आहिस्ता, जव़ाब आहिस्ता आहिसता

मेरे दिल को किया बेख़ुद तेरी अँखियाँ ने आख़िर कों
के ज्यों जूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिसता

अदा-ओ-नाज़ सो आता है वो रोशन-जबीं घर सों
की ज्यों जूँ मशरिक़ से निकले आफ़ताब आहिस्ता आहिसता
“वली” मुझ दिल मे आता है ख़याल-ए-यार बे-परवाह
के ज्यूँ अँखियाँ मले आता है ख़ाब आहिस्ता आहिसता

सोमवार, 13 जून 2011

कहाँ खो गए तुम ,ए मेरे ख़वाब !!

ए मेरे ख़वाब !!
कहाँ खो गए तुम 
याद है मुझको जब तुमने मुझसे कहा था, 
तुम तन्हा नहीं  हो
दुनया क्या सोचती है ये मत सोचो  
तुम्हारी जुस्तुजू तुम्हारे साथ है 
मुझे जीने का हुनर तुमने सिखाया
मंजिलों तक पहुँचने का रास्ता बता कर 
फिर आज क्यूँ तुम मुझसे बिछड़ गए  ?
तुम्हारी दुआओ से मंजिल मिल गयी मुझको 
लेकिन तुम मेरे ख्वाब !
तुम कहाँ खो गए ?

ऐ मेरे हुसैन ! (A tribute to M.F HUSAIN)

ऐ मेरे हुसैन !
तुम्हारे शफ्फाक कनवास पर जो रंग है ,
उनमे ये रंग क्या ज़रूरी था 
जिनमे  हर सियाह रंग वाले ,हरे, केसरया झंडो वाले,
लहू के रंग धुलते हैं 
ऐ मेरे हुसैन !
तुम्हारी स्केच बुक में ;जिसमे परतो में आड़ी-तिरछी रेखाए होती हैं 
क्या ये रेखाए भी ज़रूरी थीं 
जिनसे खद्दर और खाकी वाले ज़मीन पर रेखाएं बनाते है 
और उनको दिलो में पेवस्त कर देते है ........

शनिवार, 11 जून 2011

कबतक बम बनवाते रहोगे आदम ,,,

क्या हमेश खुश ख्याल रहोगे आदम 
कबतक प्यार को फूल, रोटी को खुशामद और क्रांति  को रेस्टारेंट कहोगे.
बढ़ के इब्लीस को क्यं नहीं बताते,
मेरे बच्चे बारूद नाहे खाते 
 कबतक बम बनवाते रहोगे आदम ,,,



शुक्रवार, 10 जून 2011

बहुत ज़रूरी जीने के लिए

रोक लो .. गर सके जाने न दो 
जाने वाले फिर लौट कर आते नहीं ...
और जाने वाला मई नही
तुम्हारा माजी ......
या सिर्फ दिल्लगी ,वो तुम्हारे जिस्म का एक हिस्सा 
बहुत ज़रूरी जीने के लिए

बुधवार, 8 जून 2011

वक़्त के कैलेण्डर से पिघल कर ....

गुलशन में झिझका गुल 
पूरी तरह बंधा भरा मन 
न बर्फ न रौशनी की दस्तक.........
सुबह की आहट :
वक़्त के कैलेण्डर से पिघल कर ....
मुहब्बत के वक़्त में जाती हुई रात की इबारत में
शयेद एक नया नुक्ता गिरने गिरने को है 
ऐसे वक़्त में मेरी जान !
मै अपने अश्क को इश्क करना चाहता हूँ 
मै आँख बंद करता हूँ चली आओ 
मेरी ज़िन्दगी की रहो को रोशन करने वाली "निशा"

गुलज़ार की इक नज़्म

मुझे अफ़सोस है सोनां
कि मेरी नज़्म से होकर गुज़रते वक्त बारिश में
परेशानी हुई तुमको
बड़े बेवक्त आते हैं यहां सावन
मेरी नज़्मों की गलियां यों भी अक्सर भीगी रहती है
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है
अगर पांव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है

मुझे अफ़सोस है लेकिन-
परेशानी हुई तुमको कि मेरी नज़्म में कुछ रोशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीजों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाख़ून कितने बार टूटे हैं-
हुई मुद्दत कि चैराहे पे अब बिजली का खंभा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुमको-
मुझे अफ़सोस है सचमुच!


भवंर से डरा हुआ , और किनारों से सहमा हुआ

मै एक अधुरा सच , या सच के समुन्दर की एक बूँद.
गुनाह के पत्थरो पे सूखती सी ,..हर पल निरंतर 
मै एक अनदेखा ख्वाब 
या नींद के साये में ख्वाब के टुकड़े ..पलकों में जम सा गया है
हर पल गिरता हुआ
मै इक छोटी सी तमन्ना .....
या आस का इक  टुकड़ा छोटा सा ,ज़िन्दगी जीने के लिए ज़रूरी सा इक एक एहसास
मै इक छोटी सी कश्ती
वक़्त के दरिया में ....बेवजह बहता हुआ
भवंर से डरा हुआ , और किनारों से   सहमा हुआ