शुक्रवार, 24 जून 2011

वली दकनी

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम को आब आहिस्ता आहिसता
की आतिश गुल को करती है ग़ुलाब गुल-आब आहिस्ता आहिसता

अजब कुछ लुत्फ़ रख़ता है शब्-ए-ख़िल्वत मे दिलबर सों
सवाद सवाल आहिस्ता आहिस्ता, जव़ाब आहिस्ता आहिसता

मेरे दिल को किया बेख़ुद तेरी अँखियाँ ने आख़िर कों
के ज्यों जूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता आहिसता

अदा-ओ-नाज़ सो आता है वो रोशन-जबीं घर सों
की ज्यों जूँ मशरिक़ से निकले आफ़ताब आहिस्ता आहिसता
“वली” मुझ दिल मे आता है ख़याल-ए-यार बे-परवाह
के ज्यूँ अँखियाँ मले आता है ख़ाब आहिस्ता आहिसता

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