बुधवार, 8 जून 2011

भवंर से डरा हुआ , और किनारों से सहमा हुआ

मै एक अधुरा सच , या सच के समुन्दर की एक बूँद.
गुनाह के पत्थरो पे सूखती सी ,..हर पल निरंतर 
मै एक अनदेखा ख्वाब 
या नींद के साये में ख्वाब के टुकड़े ..पलकों में जम सा गया है
हर पल गिरता हुआ
मै इक छोटी सी तमन्ना .....
या आस का इक  टुकड़ा छोटा सा ,ज़िन्दगी जीने के लिए ज़रूरी सा इक एक एहसास
मै इक छोटी सी कश्ती
वक़्त के दरिया में ....बेवजह बहता हुआ
भवंर से डरा हुआ , और किनारों से   सहमा हुआ


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