"उम्मीद " वसे तो इस लफ्ज़ को ही गलत मानता हूँ मै! क्यूंकि सही लफ्ज़ है "चाहत"और अगर इसको इसी तरह सही करते जाएँ तो बनेगा "तमन्ना " "आरजू " "ख्वाहिश" और उसके आगे लगाना पड़ेगा मेरी ! और तब जाके मतलब बनेगें !
मेरी ख्वाहिश है की ऐसा होजाए ,तीन दिन से ऐसा सोच रहा हूँ !और दुआ भी कर रहा हूँ !अब जब एक शख्श कहीं दिल के एक छोटे से गोशे से भी दुआ मांगता है तो उससे ईमान की सनद मांगना बेवकूफी ही होगी,
अगर उसने अपने दिल में दुआ की तो उसने क्या सोच होगा -?
आलम बाखबर ने दो बार पेंसिल उठाया कागज़ तक लगाया और वापिस रख दिया !उसको यकीन है की वो पेंसिल अब हमेशा उसके पास रहेगी अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !
मेरी ख्वाहिश है की ऐसा होजाए ,तीन दिन से ऐसा सोच रहा हूँ !और दुआ भी कर रहा हूँ !अब जब एक शख्श कहीं दिल के एक छोटे से गोशे से भी दुआ मांगता है तो उससे ईमान की सनद मांगना बेवकूफी ही होगी,
अगर उसने अपने दिल में दुआ की तो उसने क्या सोच होगा -?
आलम बाखबर ने दो बार पेंसिल उठाया कागज़ तक लगाया और वापिस रख दिया !उसको यकीन है की वो पेंसिल अब हमेशा उसके पास रहेगी अगर बदलना है किसी चीज़ को तो वो उसकी किस्मत ही क्यूँ न हो !
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