शनिवार, 4 दिसंबर 2010

अवसाद समझते  हैं ना कामरेड ? हाँ वही होगया है हमें
अब आप कहतें हैं हम बाज़ार कि गिरफ्त में हैं
अरे कामरेड बाज़ार पानी कि तरह होता है. अपना रास्ता बना ही लेता है
लो देखो ये मेरी नीली डायरी कल मैंने पन्ना पलता तो पता चला कि आखरी पन्नो में
मेरे दफ्तर का काम दर्ज था
.............हद होती है दखल कि भी ;
बस मैंने तो इसी बात से अपनर आप को समझा लिया कि चलो
अभी भी बाज़ार आखरी पन्नो पर है
......लेकिन मुआ कब अन्दर ही अन्दर पन्ना बदल ले कह नहीं सकते
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इधर कई दिनों से खबरों से दूर था और सचमुच एक छोटी दुन्य में...........या चलो बता देता हूँ
एक तहखाने (बेसमेंट) में जी रहा था.
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वैसे मै ऐसे लोगो के बीच फस हूँ हूँ कामरेड कि पुचो मत;
नज़र ना लगे बड़े जिंदादिल बन्दे हैं बहुत अच्छे.
      एक हम थे बचपन से दुन्य जहाँ के जहाज़ उदय करते थे
उम्र से बड़ी बातें;बहेस,महफ़िल,
और खुदा सलामत रखे एक ये बन्दे हैं
इतनी सीधी इतनी सपाट ज़िन्दगी;
पाश कि एक कविता याद आगे इनके ऊपर
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वसे अगर किसी दिन मेरी सोच उनलोगों के समझ में आगे तो मेरा क़त्ल वाजिब हो जायेगा उनके ऊपर;
लेकिन ये किरदार जिंदा मिसाल हैं इन लीनो के कामरेड
.....................................सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनो का मर jana

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